GPS क्या हैं? – GPS in Hindi

आज के समय में जैसे-जैसे हर चीज के लिए विज्ञान हमें सुविधा प्रदान करता जा रहा है, उसी के साथ हर चीज के लिए कई तरह के खतरे भी बढ़ते जा रहे हैं। हम उन सब चीजों की सुरक्षा तो कर सकते हैं, जो हमारी आंखों के सामने है, पर उनका क्या जो हमारे आस पास नहीं है, या हमारे नजर के सामने नहीं है। अब आप कहेंगे कि भाई मोबाइल तो है, कॉल करके सामने वाले से कभी भी बात कर सकते हैं, या उस पर आने वाले खतरे की जानकारी उसे दे सकते हैं।

आपकी बात सही है, पर यह तो खाली इंसानों के लिए बात हुई, अब अगर हम मशीनों की बात करें जैसे कि हमारी कार, हमारा मोबाइल या वह लोग जो अभी मोबाइल इस्तेमाल करना नहीं जानते हैं, या मोबाइल इस्तेमाल नहीं कर पाते हैं, जैसे कि बच्चे और बुजुर्ग लोग। अगर आपको यही पता ना हो कि यह सब अभी कहां है तो आप उन पर आने वाली मुसीबत को कैसे टाल सकेंगे। जैसे कि हमारी गाड़ी अगर चोरी हो जाए तो उसे ढूंढेंगे कैसे। अगर घर के बुजुर्ग या बच्चे कहीं खो जाए तो उन्हें कैसे ढूंढेगे या कोई कीमती चीज अगर चोरी हो जाए तो।

लेकिन अब विज्ञान ने इतनी तरक्की कर ली है के हम एक जगह बैठे बैठे दुनिया के किसी भी कोने में मौजूद किसी भी चीज की या इंसान की लोकेशन हासिल कर सकते हैं। और यह सब संभव हो पाया है सिर्फ एक टेक्नोलॉजी की वजह से और वह है जीपीएस या GPS। जीपीएस की फुल फॉर्म होती है “Global Positioning System”। इसे हिंदी में कहते हैं “वैश्विक स्थान निर्धारण प्रणाली“। साधारण शब्दों में बात करें तो दुनिया में किसी भी जगह की लोकेशन यानी कि वह कहां पर है, वहां तक पहुंचने का रास्ता या उसके अक्षांश और देशांतर और उन्नतांश क्या है यह सारी जानकारी जीपीएस से मिल जाती है।

GPS क्या हैं? – GPS in Hindi

GPS क्या हैं? - GPS in Hindi

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GPS एक Global navigation satellite system है जो की किसी भी चीज या जगह की लोकेशन पता करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। इसके लिए सेटेलाइट्स की मदद ली जाती है। मौजूदा समय में एक नहीं 24 सैटेलाइटस मौजूद हैं जो जीपीएस को सक्सेसफुली काम करने में मदद करते हैं।

सैटेलाइट दरअसल कम्युनिकेशन करने के लिए रेडियो नेवीगेशन सिस्टम को इस्तेमाल करते हैं। रेडियो नेवीगेशन सिस्टम का मतलब रेडियो वेव्स की मदद से एक जगह का डाटा रेडियो सिगनल्स में बदलकर दूसरी जगह तक पहुंचाना। हालांकि जीपीएस को यूनाइटेड स्टेट्स गवर्नमेंट कंट्रोल करती है क्योंकि जीपीएस का प्रोग्राम और सेटेलाइट सिस्टम सबसे पहले यूनाइटेड स्टेट्स गवर्नमेंट ही लेकर आई थी।

जीपीएस सिस्टम को NAVSTAR प्रणाली भी कहते हैं क्योंकि इसकी फुल फॉर्म होती है: Navigation Satellite Timing & Ranging। इसीलिए जब युनाइटेड स्टेटस ने अपने सैटेलाइट लांच किए तो उन सबका नाम भी NAVSTAR 1, 2, 3…….. रखे गए थे। यहां 1, 2, 3, 4 का मतलब जितने भी सेटेलाइट  लांच किए गए उनका नाम तो NAVSTAR ही था पर उनकी काउंटिंग के हिसाब से उन्हें सीक्वेंस नंबर दिए गए थे।

इस सिस्टम को सबसे पहले अमेरिका के Defense Department ने 1960 में बनया था। उस समय ये सिस्टम सिर्फ US Army के इस्तेमाल के लिए बनाया गया था, लेकिन बाद में 27 April 1995 में इसे आम जनता के लिए जारी कर दिया गया और जल्दी यह जनता को इतना पसंद आया कि अब धीरे-धीरे यह हर तरह की डिवाइस में इस्तेमाल होने लगा।

GPS की बुनियादी संरचना (Basic Structure) क्या है?

GPS की बुनियादी संरचना

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जीपीएस सैटेलाइट की मदद से काम करता है, पर सिर्फ सेटेलाइट ही सारा काम नहीं संभालते बल्कि इसके कुल 3 हिस्से हैं, जिनसे मिलकर पूरा जीपीएस सिस्टम बनता है और काम करता है, यह तीनों हिस्से निम्नलिखित हैं:

1) अंतरिक्ष प्रणाली ( Space Segment)

जीपीएस का सबसे पहला महत्वपूर्ण हिस्सा है अंतरिक्ष प्रणाली। इसमें सेटेलाइट आते हैं। जैसा कि हम सभी को पता है, सेटेलाइट्स धरती की सतह से थोड़ी ऊंचाई पर अपनी कक्षा में पृथ्वी के चारों ओर चक्कर लगाते रहते हैं। (यहां पर हम मानव निर्मित सेटेलाइट्स की बात कर रहे हैं। इन सेटेलाइट्स का भी एक ऑर्बिट होता है, जोकि अर्थ के ग्रेविटेशनल फोर्स के अनुसार काम करता है।) इन कृत्रिम सैटेलाइट्स को मानव अपने इस्तेमाल के लिए अंतरिक्ष में भेजता है।

इसी तरह जीपीएस के लिए भी लगभग 24 सैटेलाइट स्पेस में भेजे गए थे, जो पृथ्वी की सतह से लगभग 20000 किलोमीटर की ऊंचाई पर रहते हुए पृथ्वी के चारों तरफ अपने ऑर्बिट में चक्कर लगाते रहते हैं। यह 24 सैटेलाइट एक ही आर्बिट में नहीं रहते, बल्कि कुल मिलाकर के चार ऑर्बिट हैं। हर ऑर्बिट में 6 सैटेलाइट मौजूद रहते हैं। ऐसा इसलिए ताकि पृथ्वी पर किसी भी जगह या चीज की लोकेशन को पता करने के लिए एक्यूरेसी प्राप्त हो सके।

साधारण शब्दों में कुछ सेटेलाइट पृथ्वी की सतह के पास है, कुछ पृथ्वी की सतह से दूर। इन आर्बिट्स के बीच में 12 घंटों का अंतराल होता है, यानी कि एक ऑर्बिट से निकल के दूसरे ऑर्बिट में जाना हो तो पृथ्वी के समय के अनुसार 12 घंटे लगते हैं। यानी कि धरती पर किसी खास जगह से एक सेटेलाइट निकलता है तो अगले सेटेलाइट को वहां से निकलने में 12 घंटे लगेंगे। हालांकि इस समय को कम किया जा सकता है, पर जरूरत ना पड़ने पर दो सेटेलाइट के बीच में 12 घंटे का समय तो रहता ही है।

2) भू स्तरीय नियंत्रण कक्ष या नियंत्रण प्रणाली ( Ground Control Segment)

हालांकि सेटेलाइट्स एक बार लांच कर देने के बाद में खुद ही अपना पूरा मेंटेनेंस और अपना रास्ता डिसाइड करके आगे बढ़ते रहते हैं, लेकिन फिर भी जब एक से ज्यादा सेटेलाइट हो तो इन सबके बीच में प्रॉपर डिस्टेंस बनाए रखना, इन सब को अपने ऑर्बिट में बनाए रखना, इनके बीच के टाइम टोलरेंस को मेंटेन करना बहुत ज्यादा जरूरी हो जाता है, इसीलिए धरती से कंट्रोल रूम से इन सभी को कंट्रोल किया जाता है।
(टाइम टोलरेंस से यहां मतलब दो सेटेलाइट्स के बीच के समय अंतराल से है जो कि आमतोर पर 12 घंटे रहता है।)

सिर्फ यही नहीं बल्कि उन सभी सेटेलाइट से मिलने वाले सिगनल्स को एक्सेस करना और सेटेलाइट से मिलने वाले हर तरह के डाटा को जरूरत पड़ने पर स्टोर करके रखना यह सारा काम भी कंट्रोल रूम ही करता है। इसके अलावा कौन सेटेलाइट से कनेक्ट होने की कोशिश कर रहा है, इसके लिए परमिशन देना कितने सेटेलाइट एक बार में एक जगह की लोकेशन पता करने के लिए इस्तेमाल होंगे, इस स्ट्रक्चर को डिसाइड करना यह सारे काम भी कंट्रोल रूम ही कहता है। साधारण शब्दों में बात कहें तो जीपीएस आम जनता के इस्तेमाल के लिए है, लेकिन आम जनता इसे किस तरह से इस्तेमाल करती है, और उन्हें ज्यादा समस्याओं का सामना ना करना पड़े यह सब काम कंट्रोल रूम देखता है।

3) उपयोगकर्ता प्रणाली

उपयोगकर्ता प्रणाली का मतलब जीपीएस को इस्तेमाल करने वाले इसे कैसे इस्तेमाल कर सकते हैं। हालांकि इस हिस्से में ज्यादा तकनीकी दांवपेच नहीं है, क्योंकि आम जनता इतना ज्यादा तकनीकी नॉलेज अपने पास रखें जरूरी नहीं है। इसीलिए जीपीएस इस्तेमाल करने वाली एप्लीकेशन ही इतनी सिंपल बना दी जाती है, कि कोई भी आम आदमी भी आसानी से इन जीपीएस एप्लीकेशंस को यूज कर सकें। पर एक बात है जब भी कोई उपयोगकर्ता जीपीएस को इस्तेमाल करना चाहता है, तो उसके पास में पहला जीपीएस अनेबल डिवाइस होनी चाहिए यानी कि वह डिवाइस जिसके जरिए जीपीएस इस्तेमाल कर सके। दूसरा उस डिवाइस में जीपीएस ऑन या ऑफ करने की परमिशन उपयोगकर्ता ही देता है। वैसे तो आजकल मोबाइल फोन में भी जीपीएस फैसिलिटी आती है, इसलिए आप सभी मेरी बात समझ चुके होंगे हमारा मोबाइल ही जीपीएस अनेबल डिवाइस है, उसमें जीपीएस ऑन या ऑफ करने की सुविधा हमारे पास होती है।

यह सारी जानकारी दरअसल जीपीएस के हार्डवेयर सिस्टम को समझने के लिए है, पर अब हम बात करते हैं कि दरअसल जीपीएस काम कैसे करता है, व इतने सारे सेटेलाइट की जरूरत क्यों पड़ती है और कैसे यह सैटेलाइट दुनिया भर में मौजूद हर जीपीएस अनेबल्ड डिवाइस को सिग्नल कैसे भेज पाते हैं।

GPS काम कैसे करता है?

जीपीएस काम कैसे करता है?

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Global Positioning System (GPS) 31 सैटेलाइट्स का एक समूह है जो पृथ्वी के ऊपर 26,600 किमी की ऊंचाई पर अपनेऑर्बिट में रहते हुए पृथ्वी के चक्कर लगाते है। हालांकि इन सैटेलाइट्स का मालिकाना हक यूनाइटेड स्टेट्स के पास है, लेकिन कोई भी इन सैटेलाइट्स के सिग्‍नल का उपयोग कर सकता है, पर इसके लिए उसके पास में एक रिसीवर डिवाइस होना चाहिए जोकि उपयोगकर्ता प्रणाली में काम करता हो, दूसरा सेटेलाइट से मिलने वाले सिग्नल को एक्सेस करने के लिए आपके पास में परमिशन होनी चाहिए। वैसे तो इसकी परमिशन अलग से लेनी नहीं पड़ती है।

अगर किसी खास काम के लिए जैसे किसी जगह की लगातार मॉनिटरिंग करनी हो या किसी खास चीज को ढूंढ कर निकालना हो तो अलग से परमिशन लेनी होती है। और खासतौर से जब भी कंट्रोल रूम को ऐसा लगता है कि कोई जीपीएस का इस्तेमाल गलत इरादों के लिए कर रहा है, तो ऐसे उपयोगकर्ता से जानकारी भी मांगी जा सकती है या उसकी परमिशन कैंसल भी की जा सकती है।

(महत्वपूर्ण जानकारी: जीपीएस को सही तरह से काम करने के लिए कम से कम 24 सैटेलाइट की जरूरत होती है। पर अगस्त 2019 तक लगभग 74 सेटेलाइट छोडे जा चुके हैं। पर इनमें से सारे सेटेलाइट्स काम नहीं करते हैं। अभी लगभग 31 सेटेलाइट्स काम कर रहे हैं। 9 सेटेलाइट अभी रिजर्व में रखे गए हैं, यह रिजर्व सेटेलाइट मौजूदा 31 सैटेलाइट में से किसी भी सैटेलाइट के खराब होने पर उसकी जगह लेंगे। दो पर अभी टेस्ट चल रहा है जो कि बहुत जल्द अपनी जगह ले लेंगे। 30 सैटेलाइट अभी तक रिटायर हो चुके हैं, और 2 सैटेलाइट लॉन्च के वक्त ही खत्म हो गए। शुरुआत में यह सेटेलाइट्स धरती की सतह से 19000 किलोमीटर की ऊंचाई पर मौजूद थे पर अब यह लगभग 27000 किलोमीटर की ऊंचाई तक पहुंच चुके हैं। और ऐसा सिर्फ और सिर्फ टेक्नोलॉजी में होने वाले बदलाव की वजह से ही संभव हो पाया है। यहां पर हम जिन सेटेलाइट्स की बात कर रहे हैं, वह सारे यूनाइटेड स्टेट्स के स्वामित्व में है, पर कई देश अपने खुद के भी सेटेलाइट्स लांच कर चुके हैं जो उनके लिए जीपीएस की सुविधा उपलब्ध करवाते हैं। आप सबके लिए एक अच्छी न्यूज़ है कि भारत भी अपना खुद का जीपीएस सैटेलाइट लॉन्च कर चुका है, उसकी जानकारी हम आगे देंगे।)

अब सैटेलाइट कैसे काम करते हैं  यह तो हम सब जानते ही हैं। यह 31 सैटेलाइट एक दूसरे को लगातार सिग्नल भेजते रहते हैं, और एक दूसरे के कम्युनिकेशन में रहते हैं, और सबसे खास बात यह धरती पर मौजूद अपने सारे कंट्रोल रूम से भी जुड़े रहते हैं, और वह सारा डाटा जो सैटेलाइट कैप्चर करते हैं वह इन धरती पर मौजूद कंट्रोल रूम्स को लगातार भेजते रहते हैं। यह सेटेलाइट्स रेडियो वेव्स का इस्तेमाल करते हैं। इन रेडियो वेव्स की गति प्रकाश की गति के बराबर होती है।

दरअसल यह सेटेलाइट्स जब किसी जगह के ऊपर मौजूद होते हैं तो वहां की इमेजेस वहां की ज्योग्राफिक लोकेशन, जैसे कि वहां के अक्षांश और देशांतर यह सारी जानकारियां इकट्ठे कर लेते हैं और उन्हें धरती पर ही मौजूद कंट्रोल रूम को भेज देते हैं। इस तरह से धीरे-धीरे धरती पर मौजूद हर जगह की पूरी जानकारी कंट्रोल रूम के पास आ जाती है। अब इसका फायदा यह होता है कि कंट्रोल रूम से जब भी चाहे तो सेटेलाइट्स को कंट्रोल करके किसी भी जगह की लोकेशन पता की जा सकती है। किसी भी चीज की लोकेशन पता करी जा सकती है, चाहे वह स्थिर हो या गतिमान, यानी कि चाहे कार, बस, रेलगाड़ी, हवाई जहाज, या शिप हो, या फिर कोई बिल्डिंग या फिर कोई इंसान हो या कोई और ऑब्जेक्ट इन सब की लोकेशन पता की जा सकती है।

एक और खास बात जरूरत पड़ने पर सैटेलाइट को कंट्रोल करते हुए किसी खास जगह पर जल्द से जल्द भेजा जा सकता है, इसलिए इनका इस्तेमाल मिलिट्री वाले अपने नेविगेशन के लिए भी करते हैं। यही खास कारण था कि यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ अमेरिका ने जीपीएस का आविष्कार किया क्योंकि सबसे पहले वहां की मिलिट्री की रिक्वायरमेंट के लिए ही इस सिस्टम को डेवलप किया गया था। कंट्रोल रूम पर जो सारा डाटा इकट्ठा होता रहता है उससे पूरे धरती की हर लोकेशंस की ऑफलाइन मैपिंग होती रहती है।

सीधे शब्दों में कहें तो पूरी धरती का विस्तार से बना हुआ एक मैप इन कंट्रोल रूम पर तैयार हो जाता है। उनका फायदा यह है की कभी-कभी सेटेलाइट से सिग्नल नहीं मिलने पर भी किसी खास जगह या चीज के बारे में जानकारी इस ऑफलाइन मैप से मिल जाती है। यानी कि सेटेलाइट तो डाटा इकट्ठा करते ही हैं और उन्हें कंट्रोल रूम को भेजते हैं पर साथ ही साथ कंट्रोल रूम इस सारे डाटा को एक्सेस करता है और मैनिपुलेट भी करता है उसे उपयोगी बनाता है अब बात करते हैं रिसीवर डिवाइसेज की।

रिसीवर डिवाइसेज के काम करने के लिए सबसे पहले रिसीवर डिवाइस सेटेलाइट से कनेक्ट होती है, लेकिन सिर्फ एक सेटेलाइट से कनेक्टिविटी होने पर सही जानकारी नहीं मिल सकती है। कम से कम 3 सैटेलाइट एक बार में रिसीवर डिवाइस से कनेक्ट होने चाहिए। अगर चार सेटेलाइट हो तो यह सबसे बेहतर सेटअप सिस्टम माना जाता है, जब हम अपने रिसीवर डिवाइस में मौजूद जीपीएस को चालू करते हैं, तो ये सैटेलाइट्स सिग्‍नल का पता लगाने में एक मिनट या उससे अधिक समय ले सकते हैं, फिर पोजिशनिंग आरम्भ होने से पहले सैटेलाइट से डेटा डाउनलोड कर सकते हैं।

लेकिन यह कनेक्टिविटी तभी तक रहती है जब तक रिसीवर डिवाइस में यूजर के द्वारा दी गई परमिशन चालू रहती है, अगर यूजर वह परमिशन बंद कर देता है तो सेटेलाइट से कनेक्टिविटी टूट जाती है। पर यह कनेक्शन टूटने से पहले आखरी डाटा जो सेटेलाइट से रिसीव हुआ है वह रिसीवर डिवाइस में मौजूद रहता है। साधारण शब्दों में एक बार रिसीवर डिवाइस से कनेक्टिविटी बनाकर सेटेलाइट से डाटा डाउनलोड करने के बाद अगर कनेक्शन बंद भी कर दिया जाए तो भी वह डाटा हमारी डिवाइस पर नजर आता रहेगा।

बुनियादी और तकनीकी स्तर पर, इसे प्रभावी ढंग से काम करने के लिए दो चीजों की आवश्यकता होती है:

1) GPS रिसीवर किसी भी सैटेलाइट से कनेक्ट होने के बाद उस सेटेलाइट से खुद की दूरी को मापता है, इसके लिए वह प्रकाश की गति से ट्रैवल कर रहे सिग्‍नल्‍स के समय को मापता हैं। यानी कि रिसीवर सबसे पहले अपने सबसे पास मौजूद सेटेलाइट से कनेक्ट हो जाता है। इसके लिए रिसीवर एक सिग्नल सैटेलाइट को भेजता है, इस सिग्नल को सेटेलाइट तक पहुंचने में कितना वक्त लगा इस वक्त को रिसीवर कैलकुलेट कर लेता है। अब उसके बाद में सेटेलाइट से सिग्नल वापस रिसीवर तक पहुंचने में कितना वक्त लगा, इस वक्त को भी वापस रिसीवर कैलकुलेट करता है। इस तरह से रिसीवर और सेटेलाइट के बीच की दूरी रिसीवर को मिल जाती है। आप सभी यह सूत्र तो जानते ही होंगे:

दूरी = चाल X समय

प्रकाश की गति हमें पहले से ही पता है, और समय, रिसीवर कैलकुलेट कर लेता है। इस तरह से रिसीवर अपने और सेटेलाइट की बीच की दूरी का पता लगा लेते हैं।

2) जब सैटेलाइट की पोजीशन का पता चल जाता है, तो GPS रिसीवर एक गोले की तरह काम करता है। इसका मतलब यह है कि जीपीएस रिसीवर उस सेटेलाइट के बीच में जो कनेक्टिविटी हुई है, वह दरअसल एक स्फेयर यानी कि गोले के रूप में होती है। अब ऐसा इसलिए क्योंकि हम पहले पढ़ चुके हैं कि कम से कम 3 सैटेलाइट से रिसीवर कनेक्ट होता है व कभी-कभी चार भी होते हैं।

अब यह फिर इसलिए बनता है, क्योंकि अगर रिसीवर धरती पर स्थिर अवस्था में है, तब भी सैटेलाइट अंतरिक्ष में लगातार आगे बढ़ता रहता है, तो इसीलिए सैटेलाइट रिसीवर के बीच में बनने वाला कनेक्शन एक गोले के रूप में काम करता है। यह बिल्कुल ऐसा है जेसे हम एक जगह खड़े हो जाएं व हमने हाथ में रस्सी का एक कोना पकड़ रखा है, और उसी के दूसरे कोने में एक पत्थर बंधा हुआ है। अब जब हम उस रस्सी को गोल-गोल घुमाना शुरु करते हैं, तो वह पत्थर भी जोर जोर से घूमता रहता है, पर हम स्थित ही रहते हैं तो दरअसल उस पत्थर और हमारे बीच में एक गोलाकार कनेक्शन बन जाता है।

अब जब रिसीवर किसी सेटेलाइट से कनेक्ट होगा तो उसके एक कोने में सेटेलाइट होगा, और दूसरे कोने में वह रिसीवर डिवाइस। अब जब यही रिसीवर डिवाइस दूसरे सेटेलाइट से कनेक्ट होगा, तो उसके साथ भी उसका कनेक्शन इसी तरह एक गोले के रूप में होगा। अब दरअसल रिसीवर डिवाइस तो बीच में है, पर वह दोनों के अंतर कर्ण ( Intersect point) बिंदु पर मौजूद है।

अब जैसे ही यह रिसीवर डिवाइस तीसरे सेटेलाइट से कनेक्ट होता है, तो यह कम्युनिकेशन भी एक गोले के रूप में होता है। अब तीनों सैटेलाइट से बनने वाले गोलो के बीचो बीच में वह रिसीवर डिवाइस मौजूद है। तो इस तरह से तीनों सेटेलाइट की मदद से रिसीवर डिवाइस को अपनी असली लोकेशन आसानी से मिल जाती है, क्योंकि तीनों सैटेलाइट अपनी-अपनी जगह पर मौजूद ज्योग्राफिकल कोर्डिनेटस एक दूसरे को भेजते हैं, और रिसीवर डिवाइस को भी भेजते हैं। इन सबके कैलकुलेशन से रिसीवर डिवाइस की लोकेशन पता चल जाती है, यानी कि रिसीवर डिवाइस के अक्षांश और देशांतर।

इस प्रोसेस को trilateration के रूप में जाना जाता हैं।

जब चार सैटेलाइट और एक रिसीवर डिवाइस आपस में कनेक्ट हो जाते हैं, तब रिसीवर डिवाइस की लोकेशन की एक्यूरेसी और भी कई गुना ज्यादा बढ़ जाती है। इसीलिए चार सेटेलाइट और एक रिसीवर डिवाइस के कोम्बिनेशन को सबसे आदर्श कोम्बिनेशन माना जाता है।

GPS का इतिहास

1960 के समाप्ति होने तक ज्यादातर शक्तिशाली देश अपने हथियार खानो की निगरानी के लिए डॉपलर टेक्निक यूज करते थे। (डॉपलर टेक्निक: सेटेलाइट की मौजूदा लोकेशन में किसी भी ऑब्जेक्ट को रख दिया जाए तो उस ऑब्जेक्ट की लोकेशन सेटेलाइट की लोकेशन के साथ जुड़ जाएगी)

अमेरिका ने भी अपने हथियारों से सुसज्जित पनडुब्बियों की जानकारी, उनकी वर्तमान स्थिति जानने के लिए इसी डॉपलर टेक्निक को इस्तेमाल करना शुरू किया, पर इसमें इंफॉर्मेशन को एक कोने से दूसरे कोने तक पहुंचने में काफी समय लग जाता था, क्योंकि एक तो सेटेलाइट्स काफी कम थे, दूसरा एक सेटेलाइट को पृथ्वी का पूरा चक्कर लगाकर वापस अपनी लोकेशन तक आने में काफी समय लग जाता था, इसीलिए मिलने वाली जानकारी काफी देर से मिलती थी। इसीलिए अमेरिका एक ऐसा सिस्टम बनाना चाहता था जहां पर बहुत कम समय में उनकी पनडुब्बियों की जानकारी उन्हें बिल्कुल एक्युरेसी के साथ मिलती रहे। यहीं से जीपीएस प्रोजेक्ट की शुरुआत हुई।

1970 की शुरुआत में, Department of Defense (DoD) सैटेलाइट नेविगेशन सिस्‍टम को सुनिश्चित करना चाहता था, जिसमें सेटेलाइट की संख्या जरूरत के मुताबिक हो और उनसे मिलने वाली जानकारी की गति बाकी सब के मुकाबले काफी तेज हो, इसीलिए उन्होंने और सेटेलाइट्स बनाने का विचार बनाया जो सिर्फ और सिर्फ लोकेशंस को पहचानने, उनकी जानकारी देने के लिए ही समर्पित थे, यानी कि सिर्फ और सिर्फ जीपीएस सैटेलाइट।

1973 में Department of Defence U.S. ने जीपीएस प्रोजेक्ट को लांच किया। USDOD ने 1978  में NAVSTR सैटेलाइट लॉन्च किया।

1994 तक लगभग 24 सैटेलाइट पूरी तरह से लॉन्च कर दिए गए और इसी के साथ 1995 में यह जीपीएस प्रणाली पूरी तरह से अस्तित्व में आया। हालांकि इसकी सफलता को देखते हुए और जिस तरह से यह काम करता है, पहले इसे आम जनता के लिए उपलब्ध नहीं कराया गया क्योंकि उन्हें डर था कि कोई इसका गलत इस्तेमाल ना करें पर बाद में इसकी एक्यूरेसी को कम करके इसे आम जनता के लिए रिलीज कर दिया गया।

यानी कि एक आम आदमी इसके लिमिटेड फीचर्स को ही एक्सेस कर सकता है,  साल 2000 आते-आते जीपीएस की एक्यूरेसी आम जनता के लिए भी समानांतर कर दी गई। वैसे इसका श्रेय मशहूर उद्योगपति और तकनीकी क्षेत्र के महारथी बिल क्लिंटन को जाता है, जिन्होंने जीपीएस के एप्लीकेशंस को आसान तो बनाया ही, साथ के साथ उनमें कुछ ऐसे सिक्योरिटी फीचर्स डाल दिए कि कोई इस तकनीक का गलत इस्तेमाल ना कर सके।

आज, GPS एक बहु-उपयोगी, स्पेस-आधारित रेडिओ नेविगेशन सिस्‍टम है, जो यूएस सरकार के कंट्रोल में है, और संयुक्त राज्य अमेरिका वायु सेना द्वारा संचालित है।

वर्तमान में GPS सर्विस के दो लेवल है: Standard Positioning Service (SPS) और Precise Positioning Service (PPS) जो L1 और L2 दोनों फ्रीक्वेंसी पर P(Y) कोड का इस्‍तेमाल करती हैं।

(फ्रिक्वेंसी के बारे में हम आपको ज्यादा जानकारी नहीं दे सकते हैं।)

PPS का इस्तेमाल यूएस मिलिट्री के लिए ही किया जाता है। जबकि SPS विश्वव्यापी स्तर पर सबके लिए उपलब्ध है।

हम जीपीएस को कैसे इस्तेमाल कर सकते हैं?

जीपीएस को इस्तेमाल करना आज के समय में काफी आसान है, बस आपके पास में रिसीवर डिवाइस होना चाहिए। मोबाइल इसका सबसे साधारण उदाहरण है। आजकल हर मोबाइल में जीपीएस रिसीवर पहले से ही जुड़ा हुआ आता है, वैसे जीपीएस चिप जितनी साइज में भी इंस्टॉल किया जा सकता है, इसलिए इसे किसी भी डिवाइस में जोड़ना बहुत आसान है। यह gps-enabled डिवाइसेज या चिप्स ही हर डिवाइस के साथ जोड़ दी जाती है। जैसे कि कार, ट्रेन, हवाई जहाज, शिप यहां तक कि बिल्डिंग्स के अंदर भी जीपीएस ट्रैकर एक्टिवेट किए जाते हैं, और अगर हम चाहे तो हमारे कपड़ों में भी जीपीएस ट्रैकर लगवा सकते हैं, इससे हमारी भी लोकेशन कोई भी एक्सेस कर पाएगा।

इन डिवाइसेज में गूगल मैप नाम का सॉफ्टवेयर इंस्टॉल्ड होता है। वैसे तो और भी कई सारी एप्लीकेशंस मौजूद है, जो जीपीएस को एक्टिव करने में या इस्तेमाल करने में मदद करती है, पर गूगल मेप सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाली एप्लीकेशन है।

अगर आपके मोबाइल में गूगल मैप मौजूद नहीं है, तो आप इसे प्ले स्टोर से इंस्टॉल कर सकते हैं।

इंस्टॉल करने के बाद में आपको मोबाइल की स्क्रीन पर जाकर गूगल मैप के आइकन पर क्लिक करना होता है।

ऐसा होते ही आपके सामने एक पॉप अप मैसेज आता है, जिसमें लिखा होता है की आपको आपके मोबाइल में लोकेशन सर्विस को ऑन करना होगा। दरअसल हमने जो एप्लीकेशन इंस्टॉल करी है, वह तो सिर्फ एक एप्लीकेशन है, असली काम तो मोबाइल में मौजूद जीपीएस ट्रैकर करता है, जो एप्लीकेशन के साथ जुड़ जाता है, जीपीएस ट्रैकर को काम करने के लिए हमें परमिशन देनी होती है।

एक बार परमिशन दे देने के बाद में हमारा गूगल मैप एक्टिव हो जाता है, और हमें स्क्रीन पर एक मैप दिखाई देने लगता है, और मैप के बीच में एक ब्लू कलर का पॉइंट नजर आता है, यह ब्लू कलर का पॉइंट आपके मोबाइल की करंट लोकेशन है, और यह मैप आपके आसपास के इलाके का है, आप चाहें तो इसे ज़ूम इन और जूम आउट करके इस मेप की रेंज बढ़ा सकते हैं।

इस मेप के ऊपर की तरफ आपको डेस्टिनेशन और पिकअप नाम के ऑप्शन दिखाई देंगे। डेस्टिनेशन में आप जिस जगह की लोकेशन जानना चाहते हैं, उसका नाम लिख सकते हैं या फिर चाहे तो मैप में जाकर के उस जगह की लोकेशन को सेलेक्ट कर सकते हैं। ऐसा करते ही आपकी करंट लोकेशन से आपकी चाहे हुई डेस्टिनेशन तक के बीच की दूरी और वहां तक पहुंचने का रास्ता आपको स्क्रीन पर दिखने लग जाएगा। यहां तक कि वहां तक पहुंचने का सबसे बेहतर रास्ता और टाइम भी आपको दिखने लग जाएगा।

इसके अलावा अगर आपको सिर्फ और सिर्फ किसी लोकेशन या किसी भी जगह के बारे में जानकारी चाहिए हो तो उसको भी आप गूगल मैप के जरिए सर्च कर सकते हैं, फिर चाहे वह दुनिया के दूसरे कोने में ही क्यों ना हो। इससे उस जगह के आसपास की जानकारी, उसके आसपास का मेप हमें हमारी स्क्रीन पर शो होने लगता है, और हम उस जगह की पूरी जानकारी हासिल कर सकते हैं।

गूगल मैप कि इसी फैसिलिटी को इस्तेमाल करके आज के समय में हम हमारे आसपास के इलाके में मौजूद किसी भी तरह की जगह की जानकारी हासिल कर सकते हैं, फिर चाहे वह एटीएम हो, बैंक हो, कोई खास जगह हो या कोई रेस्टोरेंट।

और अब तो हम हमारी इजाजत से और इच्छा से हमारी लोकेशन किसी और को भी भेज सकते हैं, और इस लोकेशन से सामने वाला हमें ढूंढता हुआ हम तक पहुंच सकता है, इस कंसेप्ट को लाइव लोकेशन शेयरिंग कहते हैं।

GPS लॉकिंग क्या होती है

जीपीएस लॉकिंग का मतलब एक बार रिसीवर से सेटेलाइट के साथ कनेक्टिविटी स्थापित करके रिसीवर की लोकेशन हासिल कर ली जाती है, तो उसके बाद जब तक यह कनेक्शन स्थापित रहता है तब तक रिसीवर सेटेलाइट के साथ जुड़ा रहता है।

हालांकि सेटेलाइट की स्पीड तो 7000 mile/ hour की होती है, धरती पर कोई भी चीज इतना तेज नहीं चल सकती तो यदि रिसीवर किसी चलती हुई गाड़ी में लगा हो तो सैटेलाइट उसकी करंट लोकेशन रिसीवर को कैसे बता सकते हैं, इसका सबसे आसान तरीका है कि अगर कोई सैटेलाइट इस कम्युनिकेशन सर्कल से बाहर निकलने वाला भी है, तो भी उसके निकलते ही पीछे से एक और सेटेलाइट आकर के रिसीवर से कनेक्ट हो जाता है। अब शायद आपको समझ में आ गया होगा कि क्यों हमें कम से कम 24 सैटेलाइट की जरूरत पड़ती है ताकि धरती पर गतिमान चीजों की भी करंट लोकेशन हमेशा पता चलती रहे।

एक बार कोई रिसीवर डिवाइस सेटेलाइट के साथ जुड़ जाती है, तो वह तब तक इससे जुड़ी रहती है जब तक यूजर इस परमिशन को या इस लिंक को कैंसिल नहीं कर देता।
इस प्रोसेस को ही जीपीएस लॉकिंग प्रोसेस कहते हैं।

GPS लॉकिंग 3 तरह के होते हैं

हॉट स्टार्ट: सोचिए अगर आप एक गाड़ी में बैठे हैं।

इस समय आपका जीपीएस ट्रैकर चार सेटेलाइट से जुड़ा हुआ है, और आपके ट्रैकर पर लगातार आपकी लोकेशन अपडेट होती जा रही है, पर थोड़ी ही देर में सबसे आगे चलने वाला सैटेलाइट आपके रिसीवर की रेंज से बाहर निकल जाएगा, लेकिन वैसे बाहर निकलने से पहले वह अपनी लोकेशन अपने पीछे आने वाले सैटेलाइट को दे देता है। इसी तरह से दूसरे तीसरे और चौथे नंबर के सेटेलाइट अपनी लोकेशन अपने पीछे आने वाले सेटेलाइट्स को दे देते हैं, यानी कि पहले नंबर वाला दूसरे को, दूसरे नंबर वाला तीसरे को, तीसरे नंबर वाला चौथे को अपनी लोकेशन दे देता है और साथ के साथ अपना डाटा भी दे देता है। अब जो चौथे नंबर का सेटेलाइट है, वह दरअसल अपने पीछे आने वाले नए सेटेलाइट को अपनी लास्ट लोकेशन और डाटा दे देता है। तो जैसे ही पहला सैटेलाइट इस सर्कल से बाहर निकल भी जाए तो भी पीछे से आने वाला नया सैटेलाइट सर्कल में जुड़ जाता है। इस तरह चार सेटेलाइट हमेशा सर्कल में जुड़े रहते हैं। यह प्रोसेस इतना तेज होता है कि हमें पता भी नहीं चलता इसीलिए इसे हॉट स्टार्ट भी कहते हैं।

वार्म स्टार्ट: यह हॉट स्टार्ट की तरह ही है।

दरअसल इसमें रिसीवर डिवाइस सर्कल से बाहर होने वाले पहले सैटेलाइट के आखरी डाटा को अपने पास स्टोर कर लेता है, और फिर खुद किसी नये चौथे सेटेलाइट से कनेक्शन स्थापित करने की कोशिश करता है, और जैसे ही चौथे नये सेटेलाइट से कनेक्शन स्थापित हो जाता है तो वह रिसीवर डिवाइस अपने पास स्टोर पहले सैटेलाइट के डाटा को चौथे नए सेटेलाइट के साथ जोड़ देता है। हालांकि इसमें हॉटस्टार्ट के मुकाबले थोड़ा सा समय लगता है, इस टाइम डिले को जीपीएस ग्लिच कहते हैं, हालांकि यह इतना छोटा होता है कि हमें इन सब चीजों का पता ही नहीं लगता।

कोल्ड स्टार्ट:

इसमें रिसीवर डिवाइस अपने कम्युनिकेशन सर्कल से पूरी तरह से बाहर होने का इंतजार करती है और ऐसा होते ही फिर से नया कम्युनिकेशन सर्कल स्थापित करने की कोशिश करती है। यानी कि हर बार पूरे नए सेटेलाइट के साथ संपर्क स्थापित करती रहती है। इसमें सबसे बड़ी समस्या यह है, कि हर बार नए सेटेलाइट के साथ जोड़ के फिर से नई शुरुआत करनी पड़ती है, इसीलिए इसे कोल्ड स्टार्ट कहते हैं, क्योंकि हर बार संपर्क स्थापित करने में पहले जितना ही समय लगता है और यह एक रिन्यूअल प्रोसेस जैसा होता है।

GPS का उपयोग

जीपीएस का आविष्कार पहले कुछ खास कामों के लिए ही किया गया था, पर जल्द ही इसकी उपयोगिता देखते हुए यह जल्दी हर जगह इस्तेमाल होने लगा। जैसे कि किसी भी चीज या जगह की लोकेशन पता करने में, इमरजेंसी के वक्त अपनी लोकेशन सहायता करने वालों को भेजने के लिए, अपनी चीजों को चोरी से बचाने के लिए या चोरी हुई चीजों की स्थिति पता करने के लिए, किसी भी जगह की पूरी तरह ज्योग्राफिकल लोकेशन पता करने के लिए ताकि किसी भी तरह का नया काम शुरू करने से पहले वहां की पूरी जानकारी मिल सके जैसे की सड़कें बनाना या टेलीफोन या इलेक्ट्रिसिटी लाइन बिछाना आदि।

जीपीएस ट्रैकर का इस्तेमाल करके ऑटो पायलट जैसी सुविधा भी विकसित कर ली गई है, जिसकी मदद से बड़े एयरप्लेन और स्पेसशिप्स खुद ही लैंडिंग या टेक-आफ कर सकते हैं।

अगर कोई खो जाए और उसके पास में जीपीएस रिसीवर डिवाइस है, तो वह अपने आसपास की सारी जानकारी निकाल सकता है, और अपनी डेस्टिनेशन तक पहुंच सकता है, इसीलिए इसका इस्तेमाल कई तरह के गेम्स में भी किया जाता है।

किसी भी जगह की टाइमिंग पता करने के लिए भी जीपीएस इस्तेमाल होता है। क्योंकि धरती पर हर जगह एक जैसा टाइम नहीं चल रहा होता है। जैसे कि अगर बात करें तो यूएसए और भारत दोनों का ही समय 12 घंटों के अंतराल से चलता है, तो ऐसी कंडीशन में किसी भी जगह का समय भी हम जीपीएस की मदद से जान सकते हैं।

इसके अलावा सेटेलाइट्स की मदद से धरती की अंदरूनी परतों के बारे में भी जानकारी पता की जा सकती है, इसीलिए जीपीएस का इस्तेमाल माइनिंग में भी किया जाता है।

आजकल जानवरों की ट्रेकिंग के लिए भी जीपीएस टैग्स का इस्तेमाल किया जाता है।

इसके अलावा जैसा कि हमने बताया जीपीएस एक चिप में भी इंस्टॉल किया जा सकता है, तो इसका फायदा उठा कर के इसे किसी भी चीज के साथ जोड़ के हम हमारे बच्चों, बुजुर्गों या अपनों के किसी भी सामान के साथ इसे जोड़ सकते हैं जैसे कि उनका मोबाइल या उनके कपड़े जूते आदि। इससे हर पल हमें उनकी करंट लोकेशन हमारे रिसीवर डिवाइस पर मिलती रहती है।

कई कीमती चीजों जैसे कि प्रमुख कलाकृतियां इनमें भी जीपीएस चिप्स लगा दी जाती है ताकि अगर यह चोरी हो जाए तो भी इन की लोकेशन पता करना आसान हो।

जीपीएस के उपयोग असीमित है, बस यूं समझ लीजिए कि छोटी सी चिप किसी भी चीज के साथ जोड़कर उसकी लोकेशन कभी भी पता की जा सकती है, और इसके अलावा यह जरूरी नहीं है कि रिसीवर डिवाइस एक्टिव हो, रिसीवर डिवाइस की ऑफलाइन कंडीशन में भी सैटेलाइट की लास्ट लोकेशन की मदद से रिसीवर डिवाइस की लोकेशन आसानी से पता की जा सकती है। इन्हीं सब खूबियों की वजह से आज जीपीएस सुरक्षा का पहला कदम बन चुका है।

अलग-अलग देश और उनके जीपीएस सेटेलाइट्स

Country Navigation System
India IRNSS
Russia Glonass
China Bei-dou 2
Europe Union GALILEO
USA NAVSTAR
Japan Quasi-Zenith Satellite System

 

IRNSS की फुल फॉर्म है Indian Regional Navigation Satellite System, जिसे ISRO ने बनाया है।

GPS से जुड़े हुए कुछ रोचक तथ्य

यह सबसे कमाल की बात है कि जिन हथियारों की रक्षा के लिए सबसे पहले जीपीएस को शुरू किया गया था, आज वह जीपीएस खुद सुरक्षा मुहैया कराने का काम करता है।

सिर्फ किसी जगह की लोकेशन पता करने के लिए अब तक 74 सेटेलाइट्स स्थापित किए जा चुके हैं, यह अपने आप में एक बड़ी ही आश्चर्यजनक बात महसूस होती है, पर सत्य है।

अमेरिका के जीपीएस सैटेलाइट सारी दुनिया में जीपीएस सुविधा प्रदान करते हैं, जबकि चाइना और इंडिया के जीपीएस सैटेलाइट सिर्फ और सिर्फ अपने देश के बॉर्डर के अंदर ही रह कर काम करते हैं।

ऑटोमोबाइल्स के अंदर जीपीएस की शुरुआत 1996 में हुई थी।

जीपीएस का इस्तेमाल अल्जाइमर्स के मरीज की लोकेशन पता करने के लिए भी किया जाता है। अल्जाइमर्स एक बीमारी है जिसमें इंसान सब कुछ भूलने लगता है।

जीपीएस की खोज का श्रेय मुख्य रुप से तीन लोगों को जाता है।
Bradford Parkinson, जोकि अप्लाइड फिजिक्स लैबोरेट्री में काम करते थे।
Ivan A. Getting, जोकि एयरोस्पेस कॉरपोरेशन में काम करते थे।
Roger L. Easton, जोकि नेवल रिसर्च लैबोरेट्री में काम करते थे।

हमने इस ब्लॉग के माध्यम से जीपीएस के बारे में मुख्य मुख्य जानकारी आपको प्रदान करने की पूरी कोशिश करी है, आशा करते हैं आपको यह पसंद आया होगा। अगर आपको जीपीएस के बारे में और अधिक जानकारी चाहिए हो या ऊपर लिखे हुए कंटेंट के बारे में आपका कोई सवाल हो तो हमें कमेंट में लिखकर अवश्य बताएं।

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